ससुर का लन्ड देख मचल गयी-2 (Sasur Ka Land Dekh Machal Gayi-2)

ससुर का लन्ड देख मचल गयी-2
(Sasur Ka Land Dekh Machal Gayi-2)


मेरी सेक्सी कहानी के पिछले भाग ससुर का लन्ड देख मचल गयी-1 (Sasur Ka Land Dekh Machal Gayi-1)
में अपने पढ़ा कि मैं अपने चाचा ससुर का लन्ड देख कर पागल सी हो गयी थी, मैंने चाचा से चुदने के लिए प्रयास शुरू कर दिए थे, मैं उन्हें अपना बदन दिखाने लगी थी.
अब आगे:
धीरे धीरे चाचा जी लाइन पे तो आ रहे थे, मगर बहुत ही स्लो स्पीड में… वो मुझसे हंसी मज़ाक करते, कभी कभी कोई कोई नॉन वेज जोक भी सुना देते, मुझे कंधे पे, बाजू पे छू भी लेते। मगर मैं तो चाहती थी कि वो मेरे बूब्स पकड़ें, आते जाते मेरी गांड पर भी मारें।
मगर इतना आगे वो नहीं बढ़ रहे थे।

तो मैंने उन्हें और उत्तेजित करने के लिए अपना और नंगापन दिखाने की ठानी।

दिन में चाचाजी अक्सर हाल में बैठ कर अखबार पढ़ते या कोई किताब पढ़ते थे। हाल में से मेरा बेडरूम बिल्कुल साफ दिखता था, बाथरूम से ड्रेसिंग टेबल तक सब दिखता था। मेरे दिमाग में एक विचार आया.
एक दिन जब वो हाल में बैठे पढ़ रहे थे तो मैं नहाने चली गई और अच्छी तरह नहा के, सर के बाल धोकर सिर्फ एक तौलिया अपने बदन पर लपेट कर मैं बाथरूम से बाहर आई।

मुझे पता था कि सामने बैठे चाचाजी मुझे घूर रहे हैं, मगर मैं बिल्कुल अंजान बनी रही। तौलिया मेरे बूब्स पर काफी नीचे कर के बंधा था, क्योंकि नीचे भी मुझे अपने गोरी चूत को छुपाना था, इसलिए तौलिया मेरे बूब्स को पूरी तरह से नहीं ढक पा रहा था.

अपने गीले बालों को ड्रेसिंग टेबल के सामने खड़ी होकर सँवारने लगी, मगर निगाह मेरी बाहर ही थी और चाचाजी भी अखबार उठा कर अपने मुँह के आगे करके चोरी चोरी मुझे ताड़ रहे थे।
मैंने अलमारी से अपनी एक काली साड़ी निकाली। यह साड़ी मेरे हसबेंड ने मुझे हमारी शादी की पहली सालगिरह पर तोहफे में दी थी। साड़ी के साथ सुर्ख लाल रंग का ब्लाउज़ था। ब्लाउज़ क्या था, स्लीवलेस, पीछे से बैकलेस, और आगे ने 9 इंच का गला। अगर ब्लाउज़ में कहीं कपड़ा था, तो सिर्फ बगलों पर। इस ब्लाउज़ के साथ ब्रा नहीं पहना जाता, ब्रा वाले कप इसमें लगे हुये थे। 

मैंने चोर निगाह से देखा कि चाचाजी से उधर हाल में बैठे अपने पजामे में अपने लन्ड को पकड़ कर सहला रहे थे और उनका उठा हुआ पजामा उनके खड़े, तने हुये लन्ड का पता बता रहा था।

मैं अच्छा सा मेकअप करके किचन में चली गई चाय बनाने। मैं जानबूझ कर यह जता रही थी कि मुझे तो कुछ पता ही नहीं कि चाचाजी ने मुझे इस अधनंगी हालत में देखा है। जबकि मैं चाह रही थी कि आज तो चाचाजी अपनी मर्दानगी मुझ पर दिखा ही दें।

मैं चाय बनाने लगी और सोच रही थी कि आज चाय देते हुये अपना पल्लू गिरा कर चाचाजी को अपने हुस्न का पूरा जलवा दिखा देना है।

मगर तभी मुझे एक झटका सा लगा। चाचाजी किचन में ही आ गए, उन्होंने मुझे पीछे से पकड़ लिया, मैं एकदम शांत हो कर खड़ी हो गई, मेरे मन की मुराद पूरी हो गई थी और मैं इसे खोना नहीं चाहती थी।
मैं चुपचाप खड़ी रही तो चाचाजी ने मेरे कंधे और मेरी पीठ पर बालों से गिर रही पानी की बूंदों को अपने होंठों से उठाया, और उनके होंठों के इन चुम्बनों से मैं सिहर उठी। चाचाजी ने अपने दोनों हाथ आगे किए और मेरे दोनों मम्में पकड़ कर दबा दिये।

मैंने कुछ नहीं कहा तो उन्होंने मुझे अपनी तरफ घुमा लिया। हम दोनों ने एक दूसरे की आँखों में देखा और अगले ही पल चाचाजी ने मेरे होंठों पर अपने होंठ रख दिये, यह एक छोटा सा चुंबन था, इसलिए कि कहीं मैं उनकी किसी हरकत का विरोध तो नहीं करती।

जब मैंने चुंबन भी दे दिया, तो चाचाजी ने मेरी साड़ी का पल्लू मेरे सीने से हटा कर नीचे गिरा दिया और मेरे दोनों मम्में अपने हाथों में पकड़ कर दबा दिये।
मैंने फिर भी कुछ नहीं कहा तो चाचाजी मेरे दोनों बूब्स को पकड़े पकड़े इतनी ज़ोर उनको दूर दूर किया कि मेरे ब्लाउज़ के सभी हुक टूट गए और मेरा ब्लाउज़ खुल गया।

ब्लाउज़ खुलते ही चाचाजी ने मेरे दोनों बूब्स को अपने हाथों में पकड़ा और मेरे निप्पल को चूस लिया। मैंने अपने दोनों हाथ किचन की शेल्फ पर रखे और अपना सर पीछे को गिरा दिया, यह मेरा पूरा समर्पण था, चाचाजी को।

जब चाचाजी ने मुझे देखा तो मुझे अपनी गोद में ही उठा लिया और बोले- चलो, मेरे बेडरूम में चलते हैं।
मुझे गोद में उठा कर वो चलने लगे तो मैंने गैस बंद कर दिया और चाचाजी मुझे माथे पर, गालों पर चूमते हुये अपने बेडरूम में ले गए। बेडरूम के लेजा कर किसी फूल की तरह उन्होंने मुझे बेड पे लिटाया।

ब्लाउज़ के हुक तो मेरे पहले ही तोड़ चुके थे, मेरे ब्लाउज़ को अपने हाथ से पकड़ कर खींचा और फाड़ कर मेरा ब्लाउज़ उतार दिया। अपने चाचा ससुर से सामने मैं आधी नंगी हो चुकी थी। मेरे दोनों मम्मों को उन्होंने अपने हाथों में पकड़ कर दबा कर देखा, चूसा, चूमा, जीभ से चाटा और दाँतो से काटा भी।
मेरी सिसकारियाँ इस बात की गवाह थी कि वो अपना काम बड़ी अच्छी तरह से कर रहे थे और मुझे तड़पा तड़पा कर इतना गर्म कर रहे थे कि मैं उनके पौरुष के आगे हार जाऊँ।

मगर कम मैं भी नहीं थी।

मेरे मम्मों को अपने हाथों से मसलते हुये वो नीचे को आए और मेरी नाभि के आस पास अपनी जीभ से चाटने लगे, मेरी कमर के आस पास भी उन्होंने बहुत चूमा चाटा, मुझे बहुत गुदगुदी हुई, मैं मचल रही थी, उछल रही थी और वो मुझे इस तरह तड़पा कर मज़े ले रहे थे।

फिर मेरी साड़ी को उन्होंने मेरे पाँव के पास से ऊपर उठाया और मेरी टाँगें नंगी करने लगे। उठाते उठाते वो मेरी कमर तक मेरी साड़ी ऊपर उठा लाये। मैंने नीचे से पेंटी नहीं पहनी थी, तो साड़ी ऊपर उठाने से मैं उनके सामने नंगी हो गई।
मेरी नंगी चूत को देख कर वो खिल गए- वाह बहू, चूत को तो बहुत चिकना कर रखा है!
वो मेरी टाँगें चौड़ी करते हुये बोले।
मैंने कहा- बिल्कुल, जिस्म पर बाल न इन्हें पसंद हैं, न मुझे।

मेरी चूत की भग्नासा को अपने हाथ छूने के बाद वो नीचे झुके और मेरी भग्नासा को चूमा, और फिर अपने होंठों में मेरी भग्नासा ले कर चूसने लगे।
मेरे बदन में झनझनाहट सी होने लगी, मैंने खुद ही अपनी टांगें खोल दी पूरी तरह से कि ‘लो चाचाजी चाट लो, चाट लो अपनी बेटी जैसी बहू की चूत!’

मेरी चूत के अंदर तक वो अपनी जीभ डाल डाल कर चाट रहे थे। मैं भी अपने पाँव से उनके पजामे में कैद उनके लन्ड को छेड़ने लगी। खड़ा लन्ड उनके पजामे को तम्बू की तरह उठाए हुये था, मुझे लन्ड से छेड़खानी करते देख, चाचाजी ने अपना पजामा और देसी कच्छा दोनों उतार दिये।

अरे वाह… चाचाजी ने पूरी तरह से लन्ड के आस पास सब झांट वगैरह शेव कर रखे थे।
मैंने पूछा- चाचाजी, ये आपने कब शेव किए?

वो बोले- अरे उस दिन जब तुम चुपके से मुझे और सुमेधा को देख गई थी, तो मैं भी चुपके से तुम्हारे पीछे पीछे आया था, तुम इतनी कामुक हो चुकी थी कि तुमने बिना अपने कमरे का दरवाजा बंद किए बेड पर लेट कर उंगली करनी शुरू कर दी थी. पहले तो मैं अंदर आने लगा था कि चलो बहू की प्यास भी मिटा दूँ। फिर मैंने सोचा कि अगर ये मुझे देख कर उंगली कर रही है, तो फिर एक न एक दिन ये मुझसे भी चुदवाएगी। मैं वापिस आ गया और सुमेधा को चोदने लगा। मगर मुझे पता था, एक न एक दिन तुम मेरे नीचे आओगी, तो मैं भी पहले से ही तैयारी कर रखी थी।
मैंने मचल कर पूछा- और अगर मैं ना आती तो?

वो हंस कर बोले- न आती तो न आती… सुमेधा तो है ही, वो तो कहीं नहीं गई।
मैंने मुस्कुरा कर अपना एक पाँव चाचाजी के सर पर रखा और और उनका सर अपने पाँव से नीचे को दबाया। चाचाजी मेरे किसी गुलाम की तरह सर झुका कर मेरी चूत को फिर से चाटने लगे.

मैंने अपनी कमर थोड़ी सी ऊपर को उठाई तो वो मेरी चूत का छेद, उसके नीचे और फिर गांड को भी चाटने लगे।
“खा जाओ चाचाजी, मेरी चूत को खा जाओ!” मैंने मदमस्त होते हुये कहा।
और वो मेरी चूत गांड सब चाटते हुये ऊपर को घूमे, और अपनी कमर मेरी तरफ ले आए।

मैंने उनका कड़क लन्ड अपने हाथ में पकड़ा और उसका टोपा बाहर निकाला। मोटा, गोल, सुर्ख लाल, चमकदार लन्ड का टोपा… मेरे सबसे टेस्टी डिश। तो मैं कैसे छोडती, मैंने अपना मुँह आगे किया और चाचाजी का लन्ड अपने मुँह में ले लिया।
मेरा पसंदीदा नमकीन स्वाद और पुराने पनीर जैसी तीखी गंध… मैंने चाचाजी के लन्ड को मुँह में लिया तो वो मेरे ऊपर ही आ चढ़े, उनका लन्ड मेरे मुँह में, उनके आँड मेरे माथे पे और ऊपर उनकी गांड का छेद।

मैंने उनके दोनों चूतड़ अपने हाथों में पकड़ लिए और उनका आधे से ज़्यादा लन्ड मेरे मुँह में था। चाचाजी ने मेरी टाँगे पूरी तरह से फैला रखी थी, और अपना सारा मुँह मेरी चूत से चिपका रखा था, और मेरी चूत आस पास की सारी जगह, और मेरी गांड, चूतड़ वो सब कुछ चाट रहे थे।

मुझे महसूस हुआ जैसे उनके लन्ड से कुछ नमकीन नमकीन पानी आने लगा है। मैंने उनके लन्ड को अपने मुँह से निकाला, और उनके टोपे पर पेशाब वाले सुराख को उंगली से छू कर देखा, उसमें से गाढ़ा तार सा छूटा, मतलब चाचाजी का प्रीकम ( वीर्य गिरने से पहले छूटने वाला लेस) छूटने लगा था। मुझे तो ये भी टेस्टी लगता है। मैं फिर उनका लन्डन चूसने लगी।

चाचाजी ने भी मेरी गांड को अपने थूक से गीला करके अपनी एक उंगली मेरी गांड में डाल दी- बहू, क्या भतीजा इस जन्नत का भी मज़ा लेता है?
चाचाजी ने पूछा।
मैंने कहा- जी पापा, एक दो बार किया है, मगर मुझे दर्द होता है, तो मैं मना कर दिया।
वो बोले- तू चिंता मत कर बहू, अब देखना मैं इतने प्यार से इस जन्नत का दरवाजा खोलुंगा कि तुझे न तो दर्द होगा, और मज़ा इतना आएगा कि अगर तू चूत मरवाएगी, तो गांड मरवाये बिना भी रह नहीं पाएगी।
मैंने कहा- नहीं यार, दर्द होगा।
वो बोले- चिंता मत कर मेरी जान, अगर दर्द हुआ तो नहीं करूंगा, ठीक है?
मैंने कहा- ठीक है.
और फिर से उनका लन्ड चूसने लगी।

वो भी बड़ी शिद्दत से मेरी चूत को चाट रहे थे और गांड में उंगली आगे पीछे कर रहे थे।

फिर जैसे मुझ पर बिजली गिरी हो, मैं तड़प उठी, कसमसा उठी, अकड़ गई, मेरी चूत से पानी की जैसे धार छूटी हो, जिससे चाचाजी का सारा मुँह भीग गया।
“अरे वाह!” वो बोले और मेरी चूत में मुँह डाल कर मेरी चूत से आने वाला पानी पीने लगे, चाटने लगे। उनके चाटते चाटते मैं तड़प तड़प कर शांत हो गई और जोश जोश में मैंने उनके लन्ड को अपने दाँतो से काट भी लिया, मगर उस मर्द के बच्चे ने सी तक नहीं की।

मैं शांत हुई, तो अब उनकी बारी थी, मैंने फिर उनका लन्ड चूसना शुरू किया, वो भी मेरे मुँह को चूत समझ कर चोद रहे थे. और फिर वो अकड़े, और करीब करीब अपना सारा लन्ड मेरे मुँह में ठूंस दिया- आह, मेरी जान, सविता, मादरचोद, खा जा मेरा लन्ड, कुतिया की बच्ची, साली रांड, खा खा खा इसे हरामज़ादी!
और उन्होंने ढेर सारा माल गिराया, कितना तो मेरे गले में सीधा ही उतर गया, कितना मेरे चेहरे बालों पर बिखर गया.

मैं मुस्कुरा रही थी, एक मर्द के माल से अपना मुँह धुलवा कर… वो भी खुश थे, अपनी ही बहू से मुख मैथुन करके।

ठंडे से हो कर वो मेरी बगल में ही गिर गए, उनका लन्ड धीरे धीरे ढीला पड़ रहा था, पर उससे कोई कोई बूंद वीर्य की अभी निकल रही थी, जिसे मैं अपनी जीभ से चाट चाट कर पी रही थी।
वो बोले- बहू, तुझे माल पीना बहुत पसंद है क्या?
मैंने कहा- जी पापा, मुझे ये बहुत टेस्टी लगता है, इनका तो मैं सारा पी जाती हूँ, पर आपका तो माल गिरता ही बहुत है, इसलिए पूरा नहीं पी पाई, थोड़ा इधर उधर भी बिखर गया है।

वो पलटे और मेरे मुँह के पास मुँह करके बोले- तेरी हर प्यास बुझा दूँगा मेरी जान, तू भी क्या याद करेगी, किस मर्द से पला पड़ा है!
और वो मेरे गाल से अपना ही माल चाट गए। कुछ देर हम एक दूसरे को बांहों में भरे लेटे रहे।
फिर वो मेरे मम्मों से खेलने लगे- बहू, क्या मेरा भतीजा तुम्हें पूरी तरह से खुश नहीं कर पाता?
उन्होंने मेरे निप्पल को मसलते हुये पूछा।
मैंने कहा- पापा, खुश तो करते हैं, उनके प्यार में कोई कमी नहीं है, मैं उनसे पूरी तरह से संतुष्ट हूँ, मगर मेरी ही भूख ज़्यादा है, उन्हें अपने काम की टेंशन है, तो वो हफ्ते में सिर्फ एक दो बार ही करते हैं, मगर मुझे तो हर रोज़ चाहिए, इसलिए मुझे हर वक्त सेक्स की चाहत रहती है।

उन्होंने बड़े प्यार से एक बाप की तरह मेरे सर पर हाथ फेरा और मेरा माथा चूम कर बोले- घबरा मत बेटी, अब मैं तेरी हर इच्छा को पूरा कर दूँगा।
मैं भी खुश हो कर उनसे लिपट गई और उनके लन्ड को पकड़ कर हिलाने लगी।

वो बोले- और चाहिए?
मैंने कहा- हाँ, अभी तो सिर्फ ऊपर का मुँह तृप्त हुआ है, नीचे वाला मुँह तो अभी भी भूखा है।

चाचाजी ने मेरे होंठ अपने होंठों में ले लिए, चाहे मेरे सारे चेहरे पर उनके वीर्य की बूंदें गिरी थी जो बहुत सी उनके चेहरे पर भी लग गई, कुछ उन्होंने खुद भी चाट ली। होंठो से होंठ मिले तो जीभ से जीभ की भी मुलाक़ात हुई। वो मुझे चूस रहे थे और मैं उनको… वो मेरे मम्में मसल रहे थे और मैं उनका लन्ड!

मेरे बालों को सहलाते हुये वो बोले- कभी भैंस का दूध दुहा है?
मैंने कहा- नहीं!
वो बोले- देखा है किसी को भैंस का दूध दूहते हुये?
मैंने कहा- हाँ, देखा तो है।
वो बोले- तो मेरे लन्ड को भैंस का थन समझ कर इसे दूहो।
मैंने कहा- इतनी ज़ोर से?
वो बोले- हाँ, ज़ोर से ही मज़ा आता है, ऐसे धीरे धीरे हिलाने में कोई मज़ा नहीं।

मैंने ससुर जी के लन्ड को ज़ोर से पकड़ कर खींच खींच कर हिलाना शुरू किया, वो बोले- आह, मज़ा आ गया मेरी जान, और खींच!
मैं उनका लन्ड खींचती रही और उनका लन्ड सख्त होना शुरू हो गया और फिर से अपनी पूरी अकड़ में आ गया।

चाचा जी ने मेरी एक जांघ उठा कर अपनी जांघ पर रख ली और अपनी एक उंगली से मेरी चूत का दाना मसलने लगे। हाथ में एक मस्त लन्ड होंठ, यार के होंठों से होंठ मिले हों, और चूत में यार खुजली कर रहा हो, तो कितनी देर आप खुद पे काबू रख सकते हो। मैं भी अपने आप से अपना काबू खो बैठी और सीधी हो कर लेट गई.

मेरे सीधे लेटते ही चाचाजी मेरे ऊपर आ गए, मैंने अपने आप अपनी टाँगें पूरी खोल दी, घुटने मोड़ लिए। चाचाजी ने मेरी चूत को पहले चूमा और फिर मेरे ऊपर छ गए। मैंने खुद उनका लन्ड पकड़ा और अपनी चूत पे रखा।
“तुम्हारी चूत तो फिर से पानी छोड़ रही है!” वो बोले।
मैंने उन्हें आँख मार कर कहा- अपने यार के स्वागत के लिए सभी रास्तों पर पानी छिड़का है कि यार आराम से अंदर आ जाए।
“तो लो फिर!” चाचाजी ने कहा और अपने लन्ड को धक्का मार मार कर मेरी चूत में घुसा दिया।
ससुर का लन्ड देख मचल गयी-2 (Sasur Ka Land Dekh Machal Gayi-2)
ससुर का लन्ड देख मचल गयी-2 (Sasur Ka Land Dekh Machal Gayi-2)
चाचाजी का लन्ड मेरे पति के लन्ड से थोड़ा सा मोटा और थोड़ा सा बड़ा था। या फिर पराया लन्ड था, इसलिए मुझे ही वहम हो गया हो, मगर वो मुझे अपने पति से ज़्यादा ज़बरदस्त लगे।

एक ‘आह…’ से मैंने उनके लन्ड का अपनी चूत में स्वागत किया।
वो बोले- अब हर बार मुझे यही प्यारी आह चाहिए!

और उन्होंने फिर धक्का मारा और अपने लन्ड को मेरी चूत में और गहरे उतारा। मजबूत मर्दाना लन्ड मेरी चूत की गहराई में समा गया। मैं तो बस इसी से तृप्त हो गई थी। चाचाजी ने मुझे अपनी बांहों में कस के भर लिया और नीचे से ज़ोर ज़ोर से धक्के मारने लगे।

बहुत ही सख्त लन्ड था उनका, उनके आगोश में जकड़ी मैं ठीक से सांस नहीं ले पा रही थी और नीचे से वो मेरी चूत को छील देने की हद तक रगड़ रगड़ कर मुझे चोद रहे थे। कितनी देर मुझे वो ऐसे ही चोदते रहे और मैं बेबस लाचार सी उनके आगे हार मान रही थी, और सोच रही थी कि इस उम्र में भी इनमें कितना दम है, मैं तो फिर भी शादीशुदा हूँ, अगर कोई कच्ची कुँवारी लड़की मिल जाए, तो ये तो उसे चोद चोद कर ही जान से मार दें।

फिर चाचा जी बोले- बहू तुम्हें कौन सा पोज सबसे ज़्यादा पसंद है?
मैंने कहा- मुझे डोग्गी स्टाईल में चुदना पसंद है।
वो बोले- तो आ जा मेरी कुतिया, अब तुम्हें कुत्ती बना कर चोदूँगा।

वे पीछे हटे, उनका लाल टोपे वाला काला लन्ड मेरे चूत के पानी से भीग कर चमक रहा था। मैं उठ कर घोड़ी बन गई और वो मेरे पीछे आ गए, उन्होंने मेरे दोनों कूल्हे पकड़ लिए और अपना लन्ड मेरी चूत पे रखा, मैंने उनका लन्ड पकड़ कर सही से सेट किया, तो उन्होंने धक्का मार कर फिर से अपना लन्ड मेरी चूत में घुसेड़ दिया।

डोग्गी स्टाईल में चूत थोड़ी टाइट हो जाती है, तो इस बार लन्ड घुसने पर मैंने फिर से ‘आह…’ किया, तो चाचाजी ने एक जोरदार चपत मेरे चूतड़ पर मारी और बोले- बोल साली कुतिया, अब ठीक से घुसा न, अब देख कैसे मैं तेरी माँ चोदता हूँ।
मैंने हंस कर कहा- मेरी माँ या मुझे?
वो भी हंस कर बोले- अरे जब लन्ड खड़ा हो न, तो जो भी सामने आए बस उसी को चोद डालने को दिल करता है, तू आ गई तो तू सही, नहीं तो तेरी माँ सही। वो भी अभी कायम है, झेल लेगी मुझे।
मैंने कहा- बदमाश… किस किस पर नज़र है आपकी?

उन्होंने मेरे दूसरे चूतड़ पर ज़ोर से चपत मारी और बोले- अरे दो साल से तुम्हें बेटी कह रहा हूँ, और बेटी ही समझा है अपनी। अब अगर मैं अपनी बेटी को ही चोद रहा हूँ, तो और किसी को छोड़ूँगा क्या?
और फिर एक जोरदार चपत मेरी गांड पर पड़ी।

वो मेरे दोनों कूल्हों को बड़ी मजबूती से पकड़ कर मसल रहे थे, और बार बार मेरे चूतड़ों बार चांटे मर रहे थे।
मुझे भी उनका इस तरह से मुझे मारना, प्रताड़ित करना अच्छा लग रहा था। मार मार के मेरे दोनों चूतड़ उन्होंने लाल कर दिये, धक्के मार मार कर मेरी चूत। फिर उन्होंने मेरे दोनों चूतड़ खोल कर मेरी गांड के छेद पर थूका।

मैंने कहा- नहीं, अभी नहीं, अभी मुझे इसी में मज़ा आ रहा है। ये काम फिर कभी करेंगे।
वो बोले- अरे पगली, तेरी गांड थोड़े ही मारने जा रहा हूँ मैं, मैं तो तेरा मज़ा और दुगना कर रहा हूँ।

उसके बाद उन्होंने अपनी एक उंगली थूक में भिगो कर मेरी गांड में डाल दी। उंगली से मुझे कोई खास तकलीफ तो नहीं हुई, पर एक अजब सा रोमांच हुआ। नीचे उनका मोटा लन्ड मेरी चूत पेल रहा था और ऊपर उनकी उंगली मेरी गांड को पेल रही थी। वो बार बार थूक कर अपनी उंगली और मेरी गांड को गीला करते रहे।

एक तरह से डबल चुदाई से मैं तो बिलबिला उठी, मैंने कहा- चाचाजी, लगता है मैं झड़ने वाली हूँ।
वो बोले- तो झड़ जा साली कुतिया, ले अब झड़!
और उन्होंने न सिर्फ अपने धक्कों का ज़ोर बढ़ा दिया, बल्कि अपनी उंगली निकाल कर अपना अंगूठा मेरी गांड में घुसेड़ दिया, और वो भी बिना थूक लगा के… इस एकदम के दर्द से मैं ऐसा तड़पी कि अगले ही पल मेरा तो स्खलन हो गया।

मैं आगे को गिरने लगी तो चाचाजी ने मेरे सर के बाल पकड़ लिए, मैं आगे भी नहीं गिर सकती थी। बाल खींचने का दर्द, गांड में घुसे अंगूठे का दर्द और चूत में पत्थर जैसे सख्त लन्ड कर दर्द। मगर मैं ऐसा झड़ी कि जैसे पहले कभी मुझे सेक्स में इतना मज़ा आया ही न हो। मैं खुद अपनी कमर को आगे पीछे हिला हिला कर अपनी गांड ज़ोर ज़ोर से चाचाजी की कमर पर मार रही थी- चोदो चाचू, चोद दो, चोद दो, मार लो मेरी, जान से ही मार दो यार!

और मैं उनके शिकंजे में फंसी तड़पती रही, उन्होंने मुझे चोदना नहीं छोड़ा। मैं अपना पानी गिरा कर शांत हो गई, मगर वो लगे रहे। फिर जब मैं बिल्कुल ढीली पड़ गई तो उन्होंने मुझे छोड़ दिया। मैं बेड पे औंधी लेटी थी, वो मेरे ऊपर लेट गए, मेरी टाँगें खोली और फिर से अपना लन्ड मेरी चूत में डाल कर मुझे चोदने लगे।

कोई 5-6 मिनट की चुदाई के बाद उन्होंने अपना माल मेरी चूत और गांड पर गिरा दिया और वैसे ही मेरे ऊपर गिर गए। उनके दिल की तेज़ धड़कन मैं अपनी पीठ पर महसूस कर रही थी।

कुछ देर बाद मैं उठी और बाथरूम में जा कर नहाने लगी। वो भी उठ कर आए और मूत कर चले गए। मैं नहा कर बिल्कुल नंगी, उनके सामने से गुज़री, अपनी कमरे में गई और अलमारी से नए कपड़े निकालने लगी।
वो भी मेरे पीछे पीछे मेरे कमरे में आए और मुझे अपना बदन पौंछते और कपड़े पहनते हुये देखने लगे।

मैंने पूछा- क्या देख रहे हो चाचाजी?
वो बोले- अपनी नन्ही सी जान को सजते सँवरते देख रहा हूँ।
मैंने उनके सामने ही ब्रा पहनी, पेंटी पहनी, नई साड़ी निकाली, ब्लाउज़ पेटीकोट पहना, साड़ी बांधी।
वो मुझे देख कर अपना लन्ड हिलाते रहे बस!

जब मैं सारा मेकअप करके फिर से फ्रेश तैयार होकर उनके सामने खड़ी हुई और बोली- कैसी लग रही हूँ मैं?
वो बोले- अगर यही सब कुछ तेरी चाची करती तो आज वो मेरे साथ होती, बेवकूफ औरत को पता नहीं क्या बीमारी थी, साली मुझसे ही शर्माती रहती थी।
मैंने आगे बढ़ कर उनको अपने गले से लगा लिया- डोंट वरी चाचू यार, अब मैं हूँ न… मैं आपके पति पत्नी के सब अरमान पूरे कर दूँगी और आप मेरी सब इच्छाएँ पूरी करते रहना!
कह कर मैंने उनके होंटों का एक चुम्बन लिया तो मेरी थोड़ी सी लिपस्टिक उनके होंठो पर लग गई.

और किचन की ओर जाते हुये मैंने उनसे पूछा- चाय पियोगे?
वो बोले- हाँ, शांति (उनकी पत्नी का नाम) पीऊँगा।
ससुर का लन्ड देख मचल गयी-2 (Sasur Ka Land Dekh Machal Gayi-2) ससुर का लन्ड देख मचल गयी-2 (Sasur Ka Land Dekh Machal Gayi-2) Reviewed by Priyanka Sharma on 7:14 AM Rating: 5

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