ससुर का लन्ड देख मचल गयी-1 (Sasur Ka Land Dekh Machal Gayi-1)

ससुर का लन्ड देख मचल गयी-1
(Sasur Ka Land Dekh Machal Gayi-1)


दोस्तो, मेरा नाम सविता है, मैं हरियाणा में रहती हूँ, 27 साल की शादीशुदा औरत हूँ। मेरी शादी हो गई है इसलिए अपने लिए औरत शब्द का इस्तेमाल कर रही हूँ, वरना लड़कपन तो मुझमें अभी भी बहुत है। आज भी मैं बच्चों जैसे चुलबुली हरकतें करती हूँ, इसी लिए अपने मायके और ससुराल में सबको प्यारी लगती हूँ।

मायका तो खूब भरा पूरा परिवार है मेरा, मगर ससुराल में सिर्फ मेरे पति और मेरे ससुर ही हैं। ससुर भी सगे नहीं हैं, मेरे पति के चाचा हैं, 54 साल के हैं मगर आज भी बहुत ही चुस्त दरुस्त और तन्दरुस्त हैं। वो एक रिटायर्ड सरकारी अफसर हैं। शादी के कुछ साल बाद ही उनका अपनी पत्नी से तलाक हो गया था, उसके बाद उन्होंने नौकरी से रिटाइरमेंट ले ली, दूसरी शादी नहीं की, वो हमेशा अकेले ही रहे।

उनकी आमदनी ब्याज पर पैसा देने से और गाँव में थोड़ी बहुत खेती बाड़ी से है, एक दो समाज सेवी संस्थाए हैं जिनमें वो कभी कभार जाते रहते हैं, वरना सुबह और शाम की सैर के अलावा वो सारा दिन घर में अपने कमरे में बैठे टीवी देखते रहते हैं या साहित्यक किताबें पढ़ते रहते हैं।

चाचा अपने आप को वो बहुत फिट रखते हैं और बेशक सर के बाल और बड़ी बड़ी मूंछों के बाल आधे से ज़्यादा सफ़ेद और थोड़े से काले हैं, मगर फिर भी वो बहुत जँचते हैं।
और मैं उन्हें कभी चाचाजी तो कभी पापा कहती हूँ.

लो आप सोचोगे कि मैं अपना छोड़ कर कहाँ, चाचा का बखान करने बैठ गई।

अपने बारे में भी बता देती हूँ। शादी से पहले मैं अपने स्कूल और कॉलेज के एक बहुत ही होशियार स्टूडेंट थी, मैंने बी कॉम फ़र्स्ट डिवीज़न में किया है। मगर घर में माहौल थोड़ा टाईट होने के वजह से कभी कोई बॉयफ्रेंड नहीं बना पाई, पापा और भाई लोग से डर ही बड़ा लगता था।

मेरी सहेलियों के बॉयफ्रेंड थे, बस उनसे उनकी कहानियाँ सुन कर और रात को अपने बिस्तर पर उनके बॉय फ्रेंड से अपने खयालों में लिपट कर, सिरहाने को ही अपनी आगोश में कस कर भर कर अपना मन बहला लेती थी। अक्सर अपनी सहेलियों से सुनती उन्होंने कैसे अपने बॉयफ्रेंड से सेक्स किया और क्या क्या मज़े किए, मगर मैं तो सिर्फ अपना मन मसोस कर ही रह जाती।

जैसे जैसे मैं जवान हो रही थी, मेरा बदन भर रहा था, मेरे मम्मे, मेरे कूल्हे भारी होते जा रहे थे, देखने में भी बहुत सुंदर हूँ मैं, मेरी कई सहेलियों के बॉयफ़्रेंड्स ने मुझे भी लाइन मारी, कई अपने दोस्तों से मेरी सेटिंग की बात करी, मगर मैंने कभी हाँ नहीं कही।

इसी लिए शादी से पहले तो सच कहूँ मैं सिर्फ ब्लू फिल्मों में ही मर्द का लन्ड देखा था। जब ब्लू फिल्में देखती, तो खूब अपनी बुर मसलती, खूब पानी छोड़ती, बड़ा दिल मचलता कि कोई मुझे भी जम कर चोदे, खूब पेले, रुला दे मुझे, मगर ऐसा कोई मौका शादी से पहले मुझे नहीं मिला।

फिर जब मैं बी कॉम के फाइनल ईयर में थी तभी मेरी सगाई हो गई। मेरे पति भी देखने में बहुत ही आकर्षक हैं, पहली नज़र में ही मुझे इनसे प्यार हो गया। उसके बाद सगाई से लेकर शादी तक हम कई बार मिले, एक बार एक साथ मूवी भी देखने गए, मगर मेरे पति ने कोई जल्दबाज़ी नहीं की, सिर्फ मुझे कुछ पप्पियां जफ़्फियां ही मिली, मगर मैं इस से भी बहुत खुश थी कि जो एक बॉयफ्रेंड का सपना मैं देखती थी, वो मेरा मंगेतर पूरा कर रहा था।

इन्होंने पहले ही कह दिया था कि जितना ज़्यादा प्रेम हम अब कर लेंगे, उतना ही सुहागरात का मज़ा कम हो जाएगा।
मैंने भी अपनी सभी इछाएँ अपनी सुहाग रात तक रोक ली, दबा ली। अब 25 साल से दबा रखी थी, तो कुछ दिन और सही।

फिर मेरी शादी हुई और सुहागरात भी मनाई। सच में वो मेरी ज़िंदगी की बड़ी हसीन रात थी, वो मैं फिर कभी आप को बताऊँगी। पहले मैं आपको अपने चाचा ससुर के साथ अपना किस्सा सुनाती हूँ।

शादी के एक साल बाद तक हम दोनों मियां बीवी ने खूब मज़े किए, क्योंकि मेरी पति उस वक़्त तक अपनी कंपनी में जूनियर ऑफिसर थे, तो काम भी कम था, ज़िम्मेवारी भी कम थी। तो वो अक्सर शाम को 6 बजे तक घर आ जाते थे।

घर में भी सिर्फ चाचा जी ही तो होते थे, वो भी अक्सर शाम की सैर करने गए होते थे, तो सबसे पहले जो काम मेरे पति घर आते ही करते थे, वो था सेक्स। रात को तो रोज़ होता ही था, मगर उसके अलावा जब भी मौका मिलता या समय मिलता, हम दोनों सिर्फ और सिर्फ सेक्स करते।
25 साल की मेरी काम पिपासा को मेरे पति ने खूब शांत किया। जितनी गर्मी मेरे जिस्म में थी, मेरी बुर से सफ़ेद पानी बन कर निकली।

मैं आपको बताऊँ कि बड़ी मुश्किल लगती थी मुझे जब मुझे पीरियड्स होते, जिस दिन पीरियड्स खत्म होते, उसी दिन से फिर रोजाना सेक्स शुरू। पीरियड्स में एक दो बार मेरे पति ने पीछे से मेरी गांड में भी करने की कोशिश की, मगर मुझे उसमें कोई मज़ा नहीं आया, तो मैं उन मुश्किल दिनों में अपने पति को अपने मुँह से सुख देती। तभी मुझे उनका वीर्य पीने की आदत पड़ गई, और ऐसी आदत पड़ी कि आज तक मुझे हर बार पुरुष का माल अपने मुँह में चाहिए, शायद यही वजह है कि शादी के दो साल से भी ज़्यादा बीत जाने के बावजूद हमने अभी तक कोई बच्चा नहीं किया, क्योंकि मर्द का माल जिस छेद में गिरना चाहिए वो उस छेद की बजाए किसी और जगह से मेरे पेट में पहुँच रहा है, तो बच्चा कहाँ से हो।

शादी के बाद मैं थोड़ा और भर गई, पहले मेरे बूब्स 34 के थे, पर अब 36 के हो गए और कप साइज़ भी बढ़ कर बी से सी हो गया। बूब्स के नीचे और नाभि से ऊपर मेरे गोरी चिकनी कमर अभी भी 30 की है, पर नाभि से नीचे मेरे कूल्हे 33 से 36 हो गए हैं।
मेरे अपने शीशे ने मुझसे कई बार कहा है- सावी, तुम पहले से भी ज़्यादा सेक्सी हो गई हो।

हर महीने में करीब करीब 50 से 60 बार मेरी चुदाई होती ही होती थी। इसी लिए मुझे धीरे धीरे इस सबकी इतनी आदत सी पड़ गई, दिन में जब मैं घर में अकेली होती तो भी कई बार मेरा जी करता कि मैं सेक्स करके देखूँ।

जो काम मुझे शादी से पहले स्कूल या कॉलेज में करने चाहिए थे, वो सब मैं शादी के बाद कर रही थी।

और जब शाम को 6 बजे पति घर आते तो उनसे ज़्यादा मैं तत्पर रहती चुदाई के लिए। कभी कभी तो पहले से ही नंगी हो जाती कि कपड़े उतारने में भी समय बर्बाद न हो।
मेरे पति भी कहते- साली बड़ी चुदासी हो रही है, इतनी भी क्या आग लगी है तेरी बुर में?
मैं कहती- शादी से पहले कोई मिला नहीं, अब 25 साल की जल रही आग को आप ही तो ठंडी करोगे, अब बातें बंद और बस शुरू हो जाओ!

मैंने कभी अपने पति को ये कहने के मौका नहीं दिया ‘अरे यार, थोड़ा सा लन्ड ही चूस लो।‘ मैं हमेशा उनके कहने से पहले ही मैं उनका लन्ड चूसने लग पड़ती थी। वो भी मेरी बुर को चबा जाने की हद तक चाटते थे। बहुत बार मैं उनके मुँह में झड़ जाती।

शादी के करीब एक साल बाद इनको प्रमोशन मिला और अब सीनियर स्केल में ऑफिसर बन गए, जिस कारण इनका घर आने के कोई समय ही नहीं रहा। सुबह 9 बजे जाते तो कभी रात को 8 बजे, कभी 9 बजे कभी 10 बजे आते। मेरे तो सारे अरमान ही अधूरे रह गए।

अक्सर शाम को मैं तैयार हो कर रहती और इनका फोन आ जाता कि आज लेट आऊँगा। मैं तड़प के रह जाती। कभी कभी तो अकेले ही खाना पड़ता।

मगर फिर भी मैंने खुद को कंट्रोल किया, अपने आप को संभाला। क्योंकि तब तक मैंने अपने पति के अलावा किसी और गैर मर्द की तरफ देखा तक नहीं था। कभी कभी दिल में विचार भी आया कि पड़ोस के चोपड़ा भाई साहब भी बहुत हैंडसम हैं, मगर ऐसा करती तो हो सकता है सारे मोहल्ले में बदनाम हो जाती।
इसलिए अपने आप को काबू में रखती।

दिन में अक्सर मैं चोपड़ा जी के घर चली जाती, उनकी बीवी मेरी बहुत अच्छी दोस्त थी, चोपड़ा जी भी अपने बिजनेस के सिलसिले में बाहर होते। मैं सुबह नाश्ता बना कर, चाचा जी को नाश्ता करवा कर तैयार हो कर चोपड़ा जी घर जाती और फिर घंटा डेढ़ घंटा उनसे गप्पे मार कर अपने घर आती और फिर दोपहर का खाना बनाती। इतनी देर में मेरे पीछे से हमारी काम वाली आती और घर के सारे काम कर जाती।

ऐसे ही एक दिन मैं चोपड़ा भाभी के घर बैठी थी, तो भाई साहब का फोन आ गया कि उन्होंने बाहर कहीं जाना था, तो मैं वापिस अपने घर आ गई। घर में अंदर दाखिल हुई और किचन में गई, अभी तो बर्तन भी साफ नहीं हुये थे, झाड़ू पोंछे का काम भी अभी अधूरा था।

मैंने सोचा ‘लगता आज सुमेधा आई नहीं’ तो मैंने उसे फोन लगाया।
उसने फोन उठाया, मैंने पूछा- सुमेधा कहाँ हो?
वो उधर से बोली- दीदी, मैं तो आपके घर में हूँ, झाड़ू लगा रही हूँ।

मुझे बड़ा गुस्सा आया कि मुझसे झूठ बोल रही है, मैं किचन से बाहर आई तो देखा झाड़ू पोंछा सब हाल में पड़ा था, और उधर से सुमेधा ने फोन भी काट दिया।

मेरे गुस्से की कोई सीमा नहीं रही, मैं अभी दोबारा उसे फोन करने ही वाली थी, तभी मुझे चाचा जी के रूम से उनके बोलने की आवाज़ आई। मैं सोचने लगी, अगर झाड़ू पोंछा बाहर है तो सुमेधा अंदर क्या कर रही है।

मेरे मन में शंका सी पैदा हुई तो मैं चुपके से चाचा के रूम के दरवाजे के पास गई। दरवाजा बंद तो नहीं था, तो मैंने दरवाजे के साथ कान लगा कर सुना, मुझे दोनों के हंसने की आवाज़ आई। पहले भी चाचाजी सुमेधा से बात करते थे, मगर आज उनकी हंसी कुछ अलग सी थी।

मैंने बड़े धीरे से दरवाजा खोला और थोड़ा सा खोल कर अंदर झाँक कर देखा, अंदर तो जैसे आग लगी पड़ी थी, चाचाजी अपने बेड पर बिल्कुल नंगे लेटे थे, मोटा, लंबा काला लन्ड और सुमेधा अपनी सारी साड़ी ऊपर अपने पेट के पास पकड़ कर चाचा जी के पेट पर चढ़ी बैठी थी, और चाचाजी का लन्ड पकड़ कर अपनी बुर पर सेट कर रही थी.
ससुर का लन्ड देख मचल गयी-1 (Sasur Ka Land Dekh Machal Gayi-1)
ससुर का लन्ड देख मचल गयी-1 (Sasur Ka Land Dekh Machal Gayi-1)
और अगले ही पल चाचाजी का लन्ड उसकी बुर में घुस गया और जैसे जैसे वो नीचे को बैठती जा रही थी, उसकी बुर चाचाजी का लन्ड निगलती जा रही थी।

और ये लो… वो तो चाचाजी का सारा लन्ड खा गई… फिर लगी ऊपर नीचे होने।

मैं बाहर खड़ी उस दादा पोती की उम्र लोगों की काम लीला देख रही थी। मैं तो खुद सेक्स की हर वक़्त भूखी रहती थी, तो ये कैसे संभव था कि ये दृश्य मुझ पर असर न करता। मेरा हाथ अपने आप मेरी बुर तक चला गया। अंदर सुमेधा चाचा जी से चुदवा रही थी और दरवाजे के बाहर खड़ी मैं चाचाजी के लन्ड की दीवानी हो रही थी कि इस उम्र में भी चाचाजी में क्या दम था।

सुमेधा के गोरे चूतड़ों में चाचाजी का काला लन्ड अंदर बाहर जाने लगा। सुमेधा की बुर भी पानी छोड़ रही थी, जिस वजह से चाचाजी का लन्ड भीगा हुआ था। और उनके इस प्रेमालाप को देख कर बाहर खड़ी मेरी बुर भी पानी पानी हो रही थी। मैं देखते देखते इतना गरम हो चुकी थी कि मेरा दिल कर रहा था कि मैं भी अंदर चली जाऊँ और सुमेधा को उतार कर खुद चाचाजी के लन्ड पर चढ़ जाऊँ।
मगर ऐसा मैं नहीं कर सकती थी।

बेशक मैंने चोपड़ा भाभी से अपने चाचाजी के बारे में कुछ कुछ बातें सुन रखी थी, मगर चाचाजी ने मुझे कभी घूरा नहीं, मेरे साथ कोई हरकत नहीं की, तो मैं कैसे मान लेती के चाचाजी कुछ गलत किस्म के इंसान हैं। हो सकता है चाचाजी के अकेले रहने के कारण चोपड़ा भाभी ने ये खुद ही सोच लिया हो। मगर अब तो मेरे सामने सब कुछ खुल चुका था। एक 60-62 साल का आदमी एक 28 साल की औरत को चोद रहा था, और वो भी हमारी काम वाली बाई।

बेशक सुमेधा भी शादीशुदा थी, मगर फिर भी यार… पता नहीं नहा कर भी आती है या नहीं, गंदी सी रहने वाली, और चाचाजी उसके साथ?

मैं वापिस अपने कमरे में आ गई, मैं काम की ज्वाला से धधक रही थी, सबसे पहले अपने कपड़े उतार कर बिल्कुल नंगी हो गई, फिर नंगी ही चल कर किचन में गई और एक खीरा उठा लाई, और फिर अपने बेड पे लेट कर उस खीरे को अपनी बुर में लेकर आगे पीछे करने लगी।

उधर रूम में से सुमेधा की हल्की हल्की सीत्कार मुझे सुन रही थी और इस कमरे में मैं खीरे से अपनी बुर को ठंडा कर रही थी। चाचाजी और सुमेधा से पहले मैं झड़ गई, मैंने फिर से अपने कपड़े पहने और बेड पर बैठ कर टीवी देखने लगी।

करीब 15 मिनट बाद सुमेधा चाचाजी के कमरे से निकली और पहले झाड़ू पोंछा करने लगी।
जब वो मेरे रूम में आई, तो मुझे बेड पे बैठा देख कर एकदम से डर गई- अरे भाभी, आप यहाँ?
मैंने पूछा- क्यों अपने ही घर में मुझे नहीं होना चाहिए?
वो बोली- जी वो आप तो पड़ोस में गई थी।
मैंने कहा- हाँ गई थी, अगर ना आती तो तुम्हारी करतूत का पता कैसे चलता?

वो घबरा गई और सारा काम धाम छोड़ कर चली गई। उसके जाने के बाद मैंने ही सारे घर की सफाई की। चाचाजी भी अपने कमरे से बाहर नहीं निकले। दोपहर को मैं ही उन्हें खाना देकर आई, मगर हम दोनों में कोई बात नहीं हुई।

रात को मैंने सपने में देखा कि चाचाजी वैसे ही अपने बिस्तर पे बिल्कुल नंगे लेटे हैं और सुमेधा की जगह मैं अपनी साड़ी उठा कर उनके ऊपर बैठी उनका लन्ड ले रही हूँ।

मेरी एकदम से नींद खुल गई और मैं अपने चाचाजी के सेक्स संबंध के बारे में सोचने लगी। सोचते सोचते मैं फिर से गरम हो गई, मैंने अपने पति को जगाया, मगर वो नहीं उठे, अभी दो घंटे पहले ही तो मुझे तड़पा तड़पा कर चोदा था, और थक कर सो गए थे।

जब वो नहीं जागे तो मैंने उनका सोते हुये ही उनका ढीला लन्ड अपने मुँह में लिया और बस अगले पल ही मेरी उंगली मेरी बुर में थी। वो सोते रहे और मैं उनका ढीला लन्ड चूसते चूसते, चाचाजी से चुदवाने के खयाल में अपनी ही उंगली से अपनी बुर को ठंडा करने लगी।

अगले दिन मेरा मन बन चुका था कि कुछ भी हो जाए, मैं भी चाचाजी से सेक्स करूंगी। मगर कैसे कर सकती हूँ, और हम दोनों में कभी कोई भी ऐसी वैसी बात नहीं हुई थी, कैसे मैं चाचाजी का ध्यान अपनी और खींचूँ।
उधर सुमेधा ने शायद सारी बात चाचाजी को बता दी थी, इस वजह चाचाजी भी मुझसे कुछ कटे कटे से रहने लगे। जब बात ही नहीं हो रही हो, तो बात शुरू कैसे हो।

मगर इतना ज़रूर था कि सुमेधा अब पहले से ज़्यादा बिंदास हो गई थी, जिस दिन वो सलवार सूट पहन कर आती उस दिन हमेशा बिना दुपट्टे के चाचाजी के कमरे में जाकर साफ सफाई करती, और सबसे ज़्यादा देर वो वहीं लगाती। मैं अपने रूम में तड़पती।

फिर धीरे धीरे ये होने लगा कि चाचाजी भी कुछ बेशर्म से हो गए, और जब सुमेधा आती, उनके कमरे में सफाई करने जाती, तो अपने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लेते और सुमेधा को टिका के पेलते, उसकी चीखें, सिसकारियाँ, मुझे बाहर सुनती। वो अंदर चुदवाती, और मैं बाहर खड़ी अपनी बुर में उंगली करती।

मगर मैं कब तक उंगली करूँ, यही सोच कर मैंने सबसे पहले अपनी ड्रेसिंग सेंस को बदला। मैं पहले साड़ी अपनी नाभि से ऊपर बांधती थी। मगर अब मैंने सबसे पहले अपना पेटीकोट नीचे बांधा, जितना नीचे मैं बांध सकती थी।

जब तक सुमेधा घर में होती, मैं अपने ही रूम में रहती, मगर उसके जाने के बाद मैं अपनी साड़ी को नीचे करके बांधती ताकि मेरी नाभि दिखे, मेरी कमर दिखे। साड़ी के साथ ब्लाउज़ पहनती तो हमेशा ऊपर से एक दो बटन खुले छोड़ती, ताकि मेरे बूब्स का क्लीवेज दिखे और चाचाजी भी उसे देखें।

घर में लंबी कुर्ती की जगह शॉर्ट कुर्ती पहनने लगी, ताकि उसके नीचे से पहनी मेरी लेगिंग से मेरी टाँगों और खास करके मेरी जांघों के आकार का प्रदर्शन हो। कभी कभी जीन्स, निकर और स्कर्ट भी पहनती।

मेरी मेहनत रंग लाने लगी, मैंने नोटिस किया कि चाचाजी भी मेरी तरफ देखने लगे।

सुबह जब उठती तो नाईटी में ही चाचाजी को चाय देने जाती। नाईटी के खुले गले वो अक्सर मेरे गोरे और भरपूर मम्मों के दर्शन करते। समझ शायद वो भी गए थे कि मैं उन्हें क्या दिखा रही हूँ, और क्यों दिखा रही हूँ।
इसी वजह से वो अब मेरे साथ खुलने लगे थे।

हम दोनों की आदत थी कि अक्सर दोपहर के खाने के बाद साथ में बैठ कर बातें करते, दुनिया जहां की बातें करते। उन्होंने मुझे अपने जीवन के बारे में सब बतया।
मैंने पूछा भी- चाचाजी, डाइवोर्स के बाद आपने दोबारा शादी क्यों नहीं की?
वो बोले- मुझे ज़रूरत ही महसूस नहीं हुई।
मैंने जानबूझ कर पूछा- कोई भी ज़रूरत महसूस नहीं हुई?

वो समझ गए कि मैंने क्या पूछा है, वो बोले- मैं मेनेज कर लेता हूँ।
मैंने हंस कर कहा- सुमेधा के साथ?
वो भी हंस दिये- तो तुम्हें सब पता है।
मैंने कहा- हाँ, सब पता है, पर चलो कोई बात नहीं, आपको भी कोई साथ चाहिए, अपने दर्द भुलाने को!

वो भी हंस दिये, और मैं भी। मतलब अब सारी बात साफ हो चुकी थी।

उसके बाद तो चाचा ने जब भी सुमेधा के साथ सेक्स करना होता तो कभी भी अपने रूम के दरवाजे को लोक नहीं करते थे, बस हल्का सा ओटा देते थे।

अब तो चाचाजी भी मेरे बहुत अच्छे दोस्त बन गए थे और सुमेधा भी। वो खुल्लम खुल्ला उनके रूम में जाती और चुदवा कर आती।
मैं भी उसे मज़ाक करती- मरवा आई?
वो भी हंस के कहती- हाँ भाभी!

ऐसे ही चलता रहा, मगर चाचाजी अभी तक मुझसे थोड़ी दूरी बनाए हुये थे, जबकि मैं हर रोज़ उनके और करीब और करीब होती जा रही थी।

एक दिन मैं जानबूझ कर अपनी साड़ी अपनी कमर से भी नीची बांधी। झांट के बाल जहां से शुरू होते हैं, वहाँ बांधी। और जब मैं उनको चाय देने गई, तो चाचाजी अपने अखबार छोड़ कर मेरी तरफ देखने लगे।
मैं उनके पास जा कर खड़ी हो गई और उनसे बोली- चाचाजी चाय!
मगर वो मेरे गोरे पेट, और मेरी नाभि को ही देखे जा रहे थे।

मैंने झुक कर उनके आगे चाय का कप किया, मगर असल में मैंने उनको अपने मम्में दिखाने का जुगाड़ किया था। उन्होंने एक निगाह मेरे मम्मों की तरफ मारी और फिर चाय का कप लेकर रख लिया और जब मैं सीधी खड़ी हुई तो फिर से मेरी नाभि को देखने लगे।
मैंने पूछा- क्या देख रहे हो चाचाजी?
वो बोले- तुम्हारी नाभि!
मैंने कहा- क्या कहा आपने?

वो हड़बड़ा गए- अ… कुछ नहीं, कुछ नहीं।
मैं उनके पास ही खड़ी रही और बोली- आपको मेरी ये नई साड़ी कैसी लगी?
और मैंने साड़ी का पल्लू पकड़ कर उनको घूम कर दिखाया।

मुझे पता था कि वो मेरी कमर को ही घूर रहे थे।
वो बोले- बहुत सुंदर।
मैंने कहा- चाचाजी, मैंने सोचा है, मैं न अपनी नाभि में यहाँ एक छल्ला डलवा लूँ, ठीक है?
कह कर मैंने अपना पेट बिल्कुल उनके सामने किया, उनकी निगाह फिर से मेरी नाभि में ही अटक गई। मैंने उनका हाथ पकड़ा और उसको अपनी नाभि पर रखा। एक करंट सा मुझे लगा, मगर उन्हें तो बहुत तेज़ झटका लगा हो जैसे… उन्होंने एकदम से अपना हाथ खींच लिया।

मुझे भी लगा ये कुछ ज़्यादा हो गया तो मैं भी अपने रूम में वापिस चली आई।

अगले दिन फिर मैंने उनको अपनी नाभि के दर्शन करवाए और इस बार फिर वही नाभि में छल्ले वाली बात की और उनका हाथ अपनी नाभि पर रखा, तो उन्होंने बड़े प्यार से मेरी नाभि के इर्द गिर्द अपनी उंगली फिराई, और किसी बड़े एक्सपर्ट की तरह मुझे बताने लगे कि नाभि में छल्ला कहाँ डलवाना है।

पर उनके इस तरह से छूने से मैं तो दीवानी हुई जा रही थी। उन्होंने मेरी नाभि के अंदर भी अपनी उंगली घुसाने की कोशिश की, मैंने उसी मदहोशी में कहा- ये गलत जगह है।
वो एकदम से हट गए।

इतना तो मुझे भी साफ हो गया था कि चाचाजी अब मुझे भी चोदने की सोचते तो होंगे, मगर किसी वजह से वो हिम्मत नहीं कर पा रहे हैं। उनकी हिम्मत बढ़ाने के लिए मुझे कुछ बड़ा करना होगा।

एक बार मेरे हसबेंड किसी काम की वजह से बाहर गए हुये थे, तो रात को सोने पहले चाचाजी को जब मैं दूध देने गई तो मैंने जानबूझ कर अपनी पीली नाईटी पहनी। वो पीली नाईटी बहुत पतली थी। उस पीली नाईटी में से मेरे दोनों निप्पल और शरीर की सारी बनावट बड़े आराम से दिखाई देती थी। बस यूं समझ लो को वो नाईटी पहन कर भी मैं नंगी ही थी।

दूध का गिलास रखकर मैं भी चाचाजी के सामने उनके बेड पर ही बैठ गई। वो बैठे बैठे दूध पी रहे थे और मुझसे बातें करते करते बार बार मेरे बूब्स के निप्पल और मेरी जांघें भी ताड़ रहे थे। मैंने पूछ ही लिया- चाचाजी, क्या देख रहे हो?
उन्होंने मुझसे उल्टा सवाल पूछा- बेटा तुम ब्रा नहीं पहनती क्या?
मैंने कहा- पहनती हूँ, पर रात को उतार देती हूँ, पर आपने ऐसा क्यों पूछा?
वो बोले- वो तुम्हारे निपल्स दिख रहे थे न इसलिए पूछ लिया।
मैंने कहा- तो क्या आपकी निगाह मेरे जिस्म पर ही रहती है?

वो एकदम से चुप से हो गए जैसे मैंने उन्हें डांट दिया हो। मुझे भी लगा कि मैंने गलत बात बोल दी, मैं उठ कर जाने लगी, तो उन्होंने मेरा हाथ पकड़ लिया, बोले- बैठ जा बहू, कुछ देर बातें करते हैं, आज तो भतीजा भी नहीं है.

मैं बैठ गई और उसके बाद हम दोनों कितनी देर तक बातें करते रहे। करीब 11 बजे मैं अपने कमरे में आई। मगर मेरी बुर तो पानी पे पानी छोड़ रही थी। रूम में आते ही मैंने अपनी नाईटी उतार फेंकी और नंगी ही बेड पे जा लेटी, अपनी उंगली बुर में डाली और चाचाजी चाचाजी करती हुई ने पानी छोड़ा।
ससुर का लन्ड देख मचल गयी-1 (Sasur Ka Land Dekh Machal Gayi-1) ससुर का लन्ड देख मचल गयी-1 (Sasur Ka Land Dekh Machal Gayi-1) Reviewed by Priyanka Sharma on 7:07 AM Rating: 5

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