पति से दूर गैर मर्द से चुदाई (Pati Se Door Gair Mard Se Chudai)

पति से दूर गैर मर्द से चुदाई
(Pati Se Door Gair Mard Se Chudai)

मैं अपने घर पर अकेली ही थी मुझे अपने बैंक से लौटे हुए कुछ ही समय हुआ था तभी विवेक भी अपने बैंक से आ गए और जैसे ही वह अपने बैंक से आए तो वह मुझे कहने लगे आज तुम इतनी उदास क्यों बैठी हुई हो। मैंने उन्हें बताया कि मेरा ट्रांसफर हो गया है वह यह बात सुनते ही थोड़ा हैरान से हो गए और उन्होंने अपने हल्के से स्वर में मुझसे पूछा कि तुम्हारा ट्रांसफर कहां हुआ है। 

मैंने उन्हें बताया कि मेरा ट्रांसफर पटियाला में हो गया है वह कहने लगे क्या अब तुम पटियाला चली जाओगी तो मैंने उन्हें कहा पटियाला तो मुझे जाना ही पड़ेगा आपको तो मालूम ही है कि नौकरी का सवाल है। मैं और विवेक दिल्ली में रहते हैं हम दोनों की शादी के बाद ही हम दोनों का ट्रांसफर दिल्ली में हो गया हम दोनों बैंक में नौकरी करते हैं लेकिन मुझे नहीं पता था कि कुछ ही समय बाद मेरा ट्रांसफर पटियाला हो जाएगा। 

मैं इस बात से बहुत ही दुखी हो चुकी थी क्योंकि मुझे विवेक से दूर जाना पड़ रहा था विवेक को भी शायद यह बात मंजूर नहीं थी लेकिन मेरे पास अब और कोई रास्ता भी तो नहीं था और ना ही विवेक के पास और कोई रास्ता था।

विवेक मुझसे कहने लगे कि देखो यह नौकरी का सवाल है तुम्हें वहां जाना तो पड़ेगा ही मैंने विवेक से कहा हां विवेक तुम बिल्कुल ठीक कह रहे हो यह नौकरी का सवाल है अब मुझे वहां जाना तो है ही लेकिन तुम्हारी चिंता मुझे सता रही है कि तुम अकेले कैसे इतनी सारी चीजों को मैनेज करोगे। 

विवेक मुझे कहने लगे कोई बात नहीं माया मैं सब कुछ मैनेज कर लूंगा तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो। जब मुझे विवेक यह सब कहा तो मुझे बिल्कुल भी भरोसा नहीं हो रहा था लेकिन अब मुझे पटियाला तो जाना ही था। 

उस दिन हम दोनों ने बहुत ही कम बात कि मैं इसी ख्याल में खोई हुई थी कि पटियाला जाकर मैं क्या करूंगी क्योंकि विवेक के बिना ही मुझे वहां रहना था और विवेक भी यही सोच रहे थे कि अब हम अकेले कैसे रहेंगे। मेरे दिमाग में भी यही बात चल रही थी और मैं बहुत ही ज्यादा परेशान थी उस दिन हम लोगों ने अच्छे से खाना भी नहीं खाया और मेरा मन खाने का भी नही हुआ और ना ही विवेक का मन खाना खाने को हो रहा था। 

कुछ ही समय बाद मेरा ट्रांसफर होने वाला था करीब एक महीने तक मै विवेक के साथ रही उसके बाद मैं पटियाला चली गई।

मैं जब पटियाला गई तो वहां पर कुछ दिनों तक तो मुझे बिल्कुल भी ठीक नहीं लग रहा था मुझे बहुत ही ज्यादा बुरा लग रहा था और मुझे इस बात की भी चिंता सता रही थी कि विवेक कैसे मैनेज कर रहे होंगे क्योंकि मुझे मालूम था कि विवेक बहुत ही लापरवाह है।

मैंने विवेक को फोन किया तो विवेक कहने लगे मैं अभी बैंक में ही हूं मैंने विवेक से कहा तुम वहां पर क्या कर रहे हो तो विवेक मुझे कहने लगे बस थोड़ी देर बाद ही घर लौट रहा हूं। मैंने विवेक से कहा तुम अपना ध्यान तो रख रहे हो ना विवेक कहने लगे हां बाबा मैं अपना ध्यान रख रहा हूं तुम बिल्कुल भी चिंता मत करो मैं ठीक हूं। 

मैंने उन्हें कहा आप समय पर खाना तो खा रहे हैं वह मुझे कहने लगे हां मैं समय पर खाना खा लेता हूं। मैं और विवेक फोन पर बात कर रहे थे तभी विवेक ने मुझे कहा कि मैं तुम्हें थोड़ी देर बाद फोन करता हूं मैंने विवेक से कहा ठीक है तुम मुझे थोड़ी देर बाद फोन करना। 

विवेक ने मुझे जब यह कहा तो मैंने भी फोन रख दिया और मैंने फोन रखा तो उसके बाद विवेक का फोन मुझे शाम के वक्त आया हम दोनों एक दूसरे से फोन पर काफी देर तक बातें करते रहे। मुझे विवेक से फोन पर बातें करना अच्छा भी लग रहा था क्योंकि मैंने कभी भी सोचा नहीं था कि विवेक से मैं इतनी दूर होकर भी खुश रहने की कोशिश करूंगी। 

आज तक हम दोनों साथ में ही रहे थे विवेक और मेरी मुलाकात पहली बार कॉलेज के दौरान हुई थी जब विवेक से मैं पहली बार मिली थी तो विवेक के व्यक्तित्व ने जैसे मुझ पर छाप छोड़ दी थी और मैं विवेक पर पूरी तरीके से फिदा हो गई थी। 

विवेक बहुत हंसमुख और खुशमिजाज व्यक्ति हैं वह किसी भी बात का इतना जल्दी बुरा नहीं मानते इसीलिए तो विवेक को मैं पसंद किया करती थी और जब हम दोनों ने शादी करने का फैसला कर लिया तो हम दोनों ही बहुत खुश थे।

शादी के वक्त हमारे पुराने दोस्त हमसे मिलने के लिए आए थे लेकिन अब सब दोस्त दूर जा चुके थे सब लोग अपने काम में ही व्यस्त है और किसी का कुछ भी पता नहीं था कि आखिर वह कहां है। सब लोगों से संपर्क हो पाना बहुत मुश्किल था कुछ चुनिंदा लोग ही थे जो कि हमसे संपर्क में थे और मुझे उनसे बात करना अच्छा लगता। 

मैंने और विवेक ने उस दिन फोन पर बहुत बात की मैं सुबह जब बैंक के लिए निकलती थी तो मैं विवेक को फोन कर दिया करती थी और विवेक भी मुझे फोन कर दिया करते थे यदि कभी शाम को मैं फोन करना भूल जाती तो विवेक मुझे फोन कर दिया करते थे। अब विवेक से दूरी बिल्कुल भी बर्दाश नहीं हो रही थी विवेक मुझसे बहुत दूर थे और एक बार वह मुझसे मिलने भी आए थे लेकिन मैं चाहती थी कि विवेक और मैं अब साथ ही रहे। 

मैंने विवेक से कई बार कहा कि मैं नौकरी छोड़ देती हूं लेकिन विवेक ने कहा कि नहीं माया तुम चाहती थी ना कि तुम नौकरी करो। विवेक ने हमेशा से ही मेरी बातों का सम्मान किया है और वह मेरी हर बात को मानते हैं इसीलिए मैंने अभी तक नौकरी नहीं छोड़ी और मैं अभी नौकरी कर रही हूं। 

मै विवेक से दूरी मैं बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी और मुझे भी किसी के साथ की जरूरत है मैंने अपने एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर चलाने के बारे में सोच लिया था। मैं किसी ऐसे पुरुष की तलाश में थी जो पहले से ही शादीशुदा हो और मेरी हर इच्छा को पूरा कर सकें।

मेरी खोज उस वक्त खत्म हुई जब हमारे बैंक में राजकुमार आए राजकुमार बडे ही हंसमुख और बड़े अच्छे व्यक्तित्व के इंसान थे। उन पर मेरी नजर सिर्फ अपनी सेक्स की पूर्ति करने को लेकर थी और मैं चाहती थी कि उनके साथ में संभोग का आनंद लो। 

मैं उन पर डोरे डालने लगी जब भी मुझे मौका मिलता तो मैं अपने बदन क अंगो को उनको दिखा दिया करती थी। यह सिलसिला चलता रहा  उन्होंने मुझे कहा कि माया मैडम मुझे सब कुछ मालूम है कि आप ऐसा क्यों करती हैं। 

वह मुझे कहने लगे यदि आपको मालूम है तो आप मुझे क्यों नहीं खुश करते। मैंने जब राजकुमार से यह बात कहीं तो वह अपने आपको ना रोक सके और मुझे कहने लगे ठीक है लगता है आपकी इच्छा पूरी करनी पड़ेगी। कौन पुरुष चाहता है कि उसे कोई महिला मिले और वह उसे छोड़ दे मेरे अंदर भी आग लगी हुई थी और दूसरी तरफ से कल्पेशी के अंदर की आग को मै महसूस करना चाहती थी। 

वह भी अपनी पत्नी से दूर थे हम दोनों की जिंदगी एक समान थी उस आग को बुझाने के लिए मैंने उन्हें अपने घर पर बुलाया मैंने जब राजकुमार को अपने घर पर बुलाया तो वह घर पर आ गए।  मै उनका इंतजार काफी देर से कर रही थी जब वह घर पर पहुंचे तो मैंने उन्हें कहा आपको घर ढूंढने में परेशानी तो नहीं हुई। 

वह कहने लगे नहीं मुझे घर ढूंढने में कोई परेशानी नहीं हुई वह मुझे चोदने के लिए आए हुए थे उन्होंने अपनी पूरी तैयारी कर रखी थी। उन्होंने मुझे मेरे सोफे पर लेटाया तो वह मेरे ऊपर से आ चुके थे वह मेरे पतले और मुलायम होठों को चूमने लगे। वह मेरे होठों को बड़े अच्छे से चूस रहे थे मुझे भी अच्छा लग रहा था जैसे ही मैंने राजकुमार जी के लंड को उनकी पेंट से बाहर निकाला तो वह कहने लगे लगता है आप बड़ी जल्दी में है।

मैंने उन्हें कहा नहीं मैं इतनी भी जल्दी में नहीं हूं लेकिन मुझसे रहा नहीं जा रहा है उन्होंने कहा आप इसे अपने मुंह में ले लीजिए। मैंने उनके मोटे लंड को अपने मुंह के अंदर समा लिया और उसे सकिंग करने लगी। मुझे उनके लंड को चूसने में मजा आ रहा था मैंने काफी देर तक उनके लंड को चूसा मैंने उनके लंड के मजे अच्छे से लिए और उनके लंड से पानी बाहर की तरफ निकलने लगा। 
पति से दूर गैर मर्द से चुदाई (Pati Se Door Gair Mard Se Chudai)
पति से दूर गैर मर्द से चुदाई (Pati Se Door Gair Mard Se Chudai)
उन्हे बड़ा मजा आने लगा मैंने जैसे ही अपने दोनों पैरों को खोलते हुए अपनी पैंटी को उतारा तो राजकुमार जी ने मुझे कहा मैडम आपकी चूत तो बड़ी चिकनी है। मैंने कहा आप अपने लंड को मेरी चूत मे डाल दिजिए उन्होंने मेरी योनि पर अपने लंड को सटाते हुए अंदर की तरफ धक्का देना शुरू कर दिया। 

जैसे ही उनका लंड मेरी योनि के अंदर बाहर होता तो मुझे भी मजा आ जाता और उनको भी मजा आ रहा था काफी देर तक वह मेरी योनि के मजे लेते रहे। मेरे योनि से पानी बाहर निकल रहा था मेरी योनि से पानी बाहर निकलने लगा था जिससे कि मुझे बहुत ज्यादा दर्द होने लगा था।

वह मुझे चोदे जा रहे थे मैं बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी। उन्होंने कहा मुझे भी अच्छा लग रहा है आप ऐसे ही मेरा साथ दो उन्होंने मेरी चूत की खुजली मिटा दी। जब उन्होंने मुझे घोड़ी बनाकर मेरी योनि में लंड को डाला तो मेरे मुंह से चीख निकली। मैंने राजकुमार से कहा मुझे बड़ा दर्द हो रहा है वह कहने लगी आइए ना और तेजी से चोदा। 

उन्होंने अपनी पूरी ताकत के साथ मेरी योनि के अंदर बाहर अपने मोटे लंड को करना शुरू कर दिया। मेरी चूत कि खुजली को राजकुमार ने दूर कर दिया इतने समय से मैं राजकुमार से चूदना चाहती थी। कुछ ही क्षणों बाद राजकुमार जी ने अपने वीर्य की पिचकारी से जैसे ही मेरी योनि को नहलाया तो मैंने उन्हें कहा आपके साथ तो आज मजा ही आ गया। हम लोग हर रोज एक दूसरे के साथ संभोग का आनंद लेने लगे और मैं राजकुमार के लिए तड़पती रहती थी।
पति से दूर गैर मर्द से चुदाई (Pati Se Door Gair Mard Se Chudai) पति से दूर गैर मर्द से चुदाई (Pati Se Door Gair Mard Se Chudai) Reviewed by Priyanka Sharma on 9:22 PM Rating: 5

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